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Monday, January 4, 2021

आयुर्वेदिक के लाभ - Benefits of Ayurvedic

 आयुर्वेदिक के लाभ - Benefits of Ayurvedic

 आयुर्वेदिक के लाभ - Benefits of Ayurvedic

आयुर्वेद तन, मन और आत्‍मा के बीच संतुलन बनाकर स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार करता है। आयुर्वेद में न केवल उपचार होता है बल्कि यह जीवन जीने का ऐसा तरीका सिखाता है, जिससे जीवन लंबा और खुशहाल होता है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात, पित्‍त और कफ जैसे तीनों मूल तत्‍वों के संतुलन से कोई भी बीमारी आप तक नहीं आ सकती। लेकिन जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तो बीमारी शरीर पर हावी होने लगती है और आयुर्वेद में इन्‍हीं तीनों तत्‍वों का संतुलन बनाया जाता है। साथ ही आयुर्वेद में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने पर बल दिया जाता है ताकि किसी भी प्रकार का रोग न हो। आयुर्वेद में विभिन्‍न रोगों के इलाज के लिए हर्बल उपचार, घरेलू उपचार, आयुर्वेदिक दवाओं, आहार संशोधन, मालिश और ध्‍यान का उपयोग किया जाता है। 

आयुर्वेदिक के लाभ - Benefits of Ayurvedic
 आयुर्वेदिक के लाभ - Benefits of Ayurvedic


आयुर्वेद क्या है?

आयुर्वेद  प्राकृतिक एवं  समग्र स्वास्थ्य की पुरातन भारतीय पद्धति है| संस्कृत मूल का यह  शब्द दो धातुओं  के संयोग से बना  है - आयुः + वेद  ( "आयु " अर्थात लम्बी उम्र (जीवन ) और "वेद" अर्थात विज्ञान)| अतः आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ  जीवन  का विज्ञान है|जहाँ एलोपैथिक दवा बीमारी होने की मूल कारण पर ना जाकर इसको दूर करने पर केंद्रित होती है वहीं आयुर्वेद हमें  बीमारी होने की मूलभूत कारणों के साथ-साथ इसके इसके समग्र निदान के विषय में भी बताता है|

मूल सिद्धांत

प्रारंभ से भारत में आयुर्वेद की शिक्षा मौखिक रूप से गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत ऋषियों  द्वारा दी जाती रही है| पर लगभग 5000 साल पहले इस ज्ञान को ग्रंथों का रूप दिया गया| चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय आयुर्वेद के पुरातन ग्रंथ हैं| इन  ग्रंथो में सृष्टि में व्याप्त पंच महाभूतों - पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश  तत्वों के मनुष्यों के ऊपर होने वाले प्रभावों तथा स्वस्थ एवं  सुखी जीवन के लिए के लिए उनको संतुलित रखने के महत्ता को प्रतिपादित किया गया है| आयुर्वेद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति पर इन पांच तत्वों में से कुछ तत्वों का अन्य तत्वों की तुलना में अधिक प्रभाव होता है| आयुर्वेद इन संयोगों को तीन दोषों के रूप में वर्गीकृत करता है -

वात दोष  - जिसमें वायु और आकाश तत्त्वों की प्रधानता हो|

पित्त दोष -  जिसमें अग्नि तत्त्व की प्रधानता हो|

कफ दोष - जिसमें पृथ्वी और जल तत्त्वों की प्रधानता हो|

इन दोषों का प्रभाव  न केवल व्यक्ति की शारीरिक संरचना पर होता है बल्कि उसकी  शारीरिक प्रवृत्तियों (जैसे भोजन का चुनाव और  पाचन) और उसके मन और भावनाओं पर भी होता है| उदाहरण  के लिए कफ प्रकृति के मनुष्यों का अधिक वजन वाला होना, उनकी पाचन का अन्य प्रकृति के मनुष्यों की तुलना में धीमा होना, उनकी तेज याददाश्त और भावनात्मक रूप से उनमें स्थिरता का होना पृथ्वी तत्त्व की प्रधानता के कारण होता है| अधिकांश व्यक्तियों  की प्रकृति में  किन्हीं दो दोषों का संयोग होता है| जैसे पित्त-कफ प्रकृति वाले मनुष्य में पित्त और कफ दोनों दोषों का प्रभाव देखा जाता है पर पित्त दोष की प्रधानता देखी जाती है| अपनी  शारीरिक संरचना और प्रकृति के ज्ञान की समझ से हम इन तत्वों को संतुलित और स्वयं को स्वस्थ रखने की दिशा में आवश्यक कदम उठा सकते  हैं|

आयुर्वेद के नियम

आयुर्वेद का सिद्धांत है कि लोग एक विशिष्ट अवस्था के साथ पैदा होते हैं, जिसे प्रकृति कहा जाता है। गर्भाधान के समय स्थापित प्रकृति को भौतिक और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के एक अनोखे संयोजन के रूप में देखा जाता है जो प्रत्येक व्यक्ति के कार्य करने के तरीके को प्रभावित करता है।

जीवन भर, व्यक्ति की अंतर्निहित प्रकृति समान रहती है। हालांकि, व्यक्ति की प्रकृति दिन और रात, मौसमी बदलाव, आहार, जीवन शैली तथा विभिन्न आंतरिक, बाहरी व पर्यावरणीय कारकों से प्रभावित होती रहती है। आयुर्वेद बीमारी से बचाव पर बहुत जोर देता है। इसके लिए दैनिक और मौसमी आधार पर उचित आहार नियम के माध्यम से स्वास्थ्य बनाए रखने की सलाह देता है, जिससे व्यक्ति की प्रकृति में संतुलन बना रहता है।

आयुर्वेद कहता है कि तीन गुण होते हैं जिनसे व्यक्ति की प्रकृति की विशेषताएं निर्धारित होती हैं। इन तीन गुणों को “दोष” कहा जाता है। इन दोषों को वात, पित्त और कफ के नाम से जाना जाता है। तीनों गुणों के व्यक्ति के शारीरिक कार्यों पर विशेष प्रभाव होते हैं।

आयुर्वेदिक चिकित्सा के विद्वानों का मानना ​​है कि प्रत्येक व्यक्ति में तीन दोषों का एक नपा-तुला संतुलन है। व्यक्तिगत दोष लगातार परिवर्तित होते रहते हैं। ये व्यक्ति के भोजन, व्यायाम और अन्य कारकों से प्रभावित होते हैं।

विद्वानों का यह भी मानना ​​है कि किसी दोष के असंतुलन से उस दोष से संबंधित लक्षण उत्पन्न होते हैं, ये लक्षण किसी अन्य दोष के असंतुलन से पैदा होने वाले लक्षणों से भिन्न होते हैं। कई कारक जैसे खराब भोजन, बहुत कम या बहुत अधिक शारीरिक अथवा मानसिक तनाव, केमिकल्स या रोगाणु आदि दोषों में असंतुलन का कारण बन सकते हैं।  

दोषों में संतुलन की तरह ही, सात धातु या सप्तधातु में एक संतुलित स्थिति व्यक्ति के स्वास्थ्य का निर्धारण करने के लिए महत्वपूर्ण पैरामीटर है। ये धातु शरीर की ऊतक प्रणाली है और सात धातु में से प्रत्येक का परस्पर संबंध होता है। इनको रस धातू (प्लाज्मा और लसीका तरल पदार्थ, स्तन ग्रंथियों और इनके तरल पदार्थ तथा मासिक धर्म प्रवाह से बना है), रक्त धातू (लाल रक्त कोशिकाओं, रक्त वाहिकाओं और मांसपेशियों के टेंडन से बना है), मांस धातू (मांसपेशियों और त्वचा से बना है), मेद धातू (वसा, संयोजी ऊतकों और त्वचा के नीचे के वसायुक्त ऊतकों से बना है), अस्थि धातू (हड्डियों और दांतों से बना है), मज्जा धातू (तंत्रिका ऊतकों और अस्थि मज्जा से बना है), शुक्र धातू (प्रजनन द्रव्यों से बना है) के नाम से जाना जाता है। 

प्रत्येक धातु को पोषण आहार रस (पोषक तत्वों) से मिलता है, जो फिर अगले धातु को दिया जाता है। प्रत्येक धातु शरीर से विशिष्ट अपशिष्ट उत्पादों जैसे कि खराब सांस, आँसू, श्लेष्म और पाचन पित्त को बाहर निकालता है। धात्वग्नि (चयापचय ऊर्जा) में धातु अपने कार्य का फैसला करते हैं।

सभी धातु तीन में से किसी एक दोष द्वारा नियंत्रित होते हैं। उदाहरण के लिए, कफ दोष रस, मांस, मेद और शुक्र धातुओं को नियंत्रित करता है। पित्त दोष मज्जा और रक्त धातुओं को नियंत्रित करता है और वात दोष अस्थि धातु को नियंत्रित करता है।

ओजस सभी धातुओं का अंतिम सार है और हमारी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का आधार है। यह शरीर के हर हिस्से में व्याप्त है। ओजस कम होने के कारण चिंता, भय, खुशी में कमी, खराब रंगत, संवेदी अंग में दर्द, दुर्बलता, प्रतिरक्षा प्रणाली संबंधी विकार जैसे लक्षण होते हैं। 

आयुर्वेदिक उपचार के फायदे

वैसे तो आयुर्वेद का सबसे बड़ा लाभ यही है कि इससे रोगों का निवारण हो सकता है। लेकिन आयुर्वेदिक इलाज के कुछ विशेष फायदे भी होते हैं, जैसे: 

  • आयुर्वेद से लोगों को यह जानने में मदद मिलती है कि किस प्रकार का भोजन, रंग, सुगंध, आवाज और स्पर्श उनके शरीर और मन में संतुलन और सामंजस्य की स्थिति पैदा करता है। जब शरीर और मन सामंजस्य में होते हैं, तो शरीर की सामान्य अवस्था बहाल होती है और यह स्वस्थ हो जाता है।
  • आयुर्वेदिक चिकित्सा का मुख्य लाभ यह भी है कि इनमें कोईहानिकारक तत्व नहीं होते हैं और इनका उपयोग करना काफी सुरक्षित होता है।
  • आयुर्वेद हजारों वर्षों से एक भरोसेमंद और प्रामाणिक उपचार बना हुआ है। इसलिए अन्य उपलब्ध चिकित्सा विकल्पों की तुलना में आयुर्वेद के पास रोगों के इलाज कासबसे अधिक अनुभव है। यह भी इसका एक बहुत बड़ा लाभ है।

 

आयुर्वेदिक दवा के नुकसान

आयुर्वेदिक चिकित्सा की प्राचीन पद्धती ने स्पष्ट रूप से लाखों लोगों को स्वस्थ जीवन प्रदान करने में मदद की है। हालांकि, किसी भी अन्य चिकित्सा प्रणाली की तरह, आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी दुष्प्रभाव होने की संभावनाएं हैं। यह विशेष रूप से चिंता का विषय तब होता है जब थेरेपी का गलत तरीके से उपयोग किया जाता है अथवा अनुचित तरीके से दुरुपयोग या उपयोग किया जाता है अथवा किसी अयोग्य चिकित्सक द्वारा इलाज किया जाता है। इसलिए उपचार करवाते समय एक अच्छे प्रशिक्षित आयुर्वेद के डॉक्टर को ही चुने और उसके बताए अनुसार इलाज का पालन करें।

यद्यपि आयुर्वेद जड़ी बूटियों और प्राकृतिक उपचारों का उपयोग करता है, लेकिन किसी भी आयुर्वेदिक दवा को लेने से पहले एक योग्य और अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करना सबसे अच्छा होता है। एक आयुर्वेदिक चिकित्सक व्यक्ति की प्रकृति और रोग पैदा करने वाले दोषों जैसे विभिन्न कारकों को ध्यान में रखता है। इसके बाद वह एक व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति के आधार पर उपचार के कोर्स की योजना बनाता है।

आयुर्वेद में परहेज

बढ़ते जीवनशैली संबंधी रोग खाद्य पदार्थों के गलत चुनाव का परिणाम है। चीनी और अंग्रेजी (एंग्लिकन) खाद्य पदार्थों का सेवन करने की अंधी नकल आपको शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दोनों तरह से प्रभावित कर रही है। आजकल, चीनी और अंग्रेजी खाद्य पदार्थों की अधिक खपत के कारण युवाओं में पेट की समस्याओं में वृद्धि हुई है। आयुर्वेद आधारित आहार में ताजा भोजन बहुत महत्वपूर्ण होता है।

आयुर्वेद में सभी को शुद्ध शाकाहारी खाद्य पदार्थ खाने की सलाह दी जाती है। यह हमेशा शाकाहारी भोजन की आदतों का समर्थन करता है। खाद्य पदार्थों के सेवन पर आयुर्वेद के स्पष्ट नियम है। यह भोजन की आदतों की बहुत प्राचीन पारंपरिक शैली पर निर्भर करता है। इसमें वह सब कुछ है जो आप एक सर्वोत्तम आहार और औषधि संबंधी सुझाव में पसंद करेंगे। 

आयुर्वेदिक आहार में स्वाद की भी प्रासंगिकता काफी अधिक है। आयुर्वेद में मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कड़वा और कसैला जैसे छह महत्वपूर्ण स्वाद बताए गए हैं। इन छह स्वादों की भागीदारी के साथ आयुर्वेद आधारित आहार शरीर के वजन को कम करने में प्रभावी भूमिका निभाएगा। 

आयुर्वेदिक आहार विशेष रूप से "अग्नि" के बारे में बात करता है। आयुर्वेद का कहता है कि अग्नि के बिना जीवन संभव नहीं है और इसमें जीवन को बढ़ावा देने की शक्ति है। जीवन का मुख्य स्रोत अग्नि है। अग्नि को पाचन अग्नि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। आयुर्वेदिक भोजन अग्नि की अवधारणा से गहराई से जुड़ा हुआ है। सभी को भोजन की आदतों के बारे में सावधान रहना चाहिए और पाचन अग्नि को कमजोर नहीं होने देना चाहिए 

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